सभापति के लक्षणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (अस्मै) इस [संसार] के हित के लिये (इत्) ही (उ) विचारपूर्वक (गिर्वाहसे) विद्याओं के पहुँचानेवाले, (मेधिराय) बुद्धिमान् (इन्द्राय) इन्द्र [बड़े ऐश्वर्यवाले सभापति] के लिये (सुवृक्ति) सुन्दर ग्रहण करने योग्य क्रियाओं के साथ (विश्वमिन्वम्) सबमें फैलनेवाले (स्तोमम्) स्तुतियोग्य व्यवहार (च) औऱ (गिरः) वेदवाणियों को (सम्) यथावत् (हिनोमि) मैं बढ़ाता हूँ, (रथम्) रथ को (तष्टा इव) जैसे विश्वकर्मा [बड़ा जाती बढ़ई] (न) अब (तत्सिनाय) उस [रथ] से अन्न के लिये बढ़ाता है ॥४॥
Connotation: - जैसे विद्वान् शिल्पी कला यन्त्र लगाकर सुन्दर रथ बनाकर उससे अन्न आदि पदार्थ प्राप्त करता-कराता है। वैसे ही मनुष्य बुद्धिमान् पुरुष से आदर के साथ उत्तम गुण ग्रहण करके आनन्द पावें ॥४॥