विद्वानों के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (प्रथमः) सबसे पहिले वर्तमान (अथर्वा) निश्चल परमात्मा ने (यज्ञैः) संगति कर्मों [परमाणुओं के मेलों] से (पथः) मार्गों को (तते) फैलाया, (ततः) फिर (व्रतपाः) नियम पालनेवाला, (वेनः) पियारा (सूर्यः) सूर्यलोक (आ) सब ओर (अजनि) प्रकट हुआ। (उशना) पियारे, (काव्यः) बड़ाई योग्य उस [सूर्य] ने (गाः) पृथिवियों [चलते हुए लोकों] को (आ) सब ओर (आजत्) खींचा हैं, (यमस्य) उस नियमकर्ता परमेश्वर के (सचा) मेल से (जातम्) उत्पन्न हुए (अमृतम्) अमरण [मोक्षसुख वा जीवनसामर्थ्य] को (यजामहे) हम पाते हैं ॥॥
Connotation: - जिस परमात्मा ने आकाश, सूर्य, पृथिवी आदि लोक बनाकर हमें जीवन दिया है, उस बड़े जगदीश्वर की उपासना से विद्वान् लोग आत्मिक बल बढ़ाकर मोक्षसुख भोगें ॥॥