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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (नः) हमारा (होता) ग्रहण करनेवाला, (ऋत्वियः) सब ऋतुओं में प्राप्त होनेवाला [राजा] (सत्तः) बैठा है, (बर्हिः) उत्तम आसन (आनुषक्) निरन्तर [यथाविधि] (तिस्तिरे) बिछाया गया है, (अद्रयः) मेघ [के समान उपकारी पुरुष] (प्रातः) प्रातःकाल में (अयुज्रन्) जुड़ गये हैं ॥२॥
Connotation: - विद्वान् लोग एकत्र होकर प्रजापालक राजा का उत्तम आसन आदि से सत्कार करके हित के लिये निवेदन करें ॥२॥
Footnote: २−(सत्तः) षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु-क्त। निषण्णोऽस्ति (होता) आदाता (नः) अस्माकम् (ऋत्वियः) अ० ३।२०।१। सर्वकालेषु प्राप्तः (तिस्तिरे) स्तॄञ् आच्छादने-कर्मणि लिट्। ॠत इद्धातोः। पा० ७।१।१००। इति इत्वम्, द्विर्वचनम्। शर्पूर्वाः खयः। पा० ७।४।६१। इति तकारस्य शेषः। लिटस्तझयोरेशिरेच्। पा० ३।४।८१। इति एश् इत्यादेशः। आच्छादितं बभूव (बर्हिः) उत्तममासनम् (आनुषक्) अ० ४।३२।१। निरन्तरम्। यथाविधि (अयुज्रन्) संगता अभूवन् (प्रातः) प्रातःकाले (अद्रयः) अद्रिर्मेघनाम-निघ० १।१०। मेघा इवोपकारिणः पुरुषाः ॥
