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समि॑न्द्र रा॒या समि॒षा र॑भेमहि॒ सं वाजे॑भिः पुरुश्च॒न्द्रैर॒भिद्यु॑भिः। सं दे॒व्या प्रम॑त्या वी॒रशु॑ष्मया गोअग्र॒याश्वा॑वत्या रभेमहि ॥

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Pad Path

सम् । इन्द्र । राया । सम् । इषा । रभेमहि । सम् । वाजेभि: । पुरुऽचन्द्रै: । अभिद्युऽभि: ॥ सम् । देव्या । प्रऽमत्या । वीरशुष्मया । गोऽअग्रया । अश्वऽवत्या । रभेमहि ॥२१.५॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:21» Paryayah:0» Mantra:5


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मनुष्यों के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजा वा परमात्मा] हम (राया) सम्पत्ति से (सम्) संयुक्त, (इषा) अन्न से (सम्) संयुक्त, और (पुरुश्चन्द्रैः) बहुत सुवर्ण आदि वाले तथा (अभिद्युभिः) सब ओर से व्यवहारवाले (वाजेभिः) विज्ञानों [वा बलों] से (सं रभेमहि) संयुक्त होवें। और (देव्या) दिव्य गुणवाली, (वीरशुष्मया) वीरों को बल देनेवाली, (गोअग्रया) श्रेष्ठ गौओं वा देशोंवाली और (अश्ववत्या) वेगयुक्त घोड़ोंवाली (प्रमत्या) उत्तम बुद्धि से (संरभेमहि) हम संयुक्त होवें ॥॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वर की भक्ति और न्यायी राजा की सुनीति से अनेक प्रकार विज्ञानी और बलवान् होकर श्रेष्ठ बुद्धि के साथ उन्नति करते रहें ॥॥
Footnote: −(सम्) सम्भूय (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् परमात्मन् वा (राया) सम्पत्त्या (इषा) अन्नेन (सं रभेमहि) संगता भवेम (सम्) (वाजेभिः) विज्ञानैः। बलैः (पुरुश्चन्द्रैः) चन्द्रं हिरण्यनाम-निघ० १।२। बहुसुवर्णादियुक्तैः (अभिद्युभिः) सर्वतो व्यवहारोपेतैः (सम्) (देव्या) दिव्यगुणवत्या (प्रमत्या) प्रकृष्टबुद्ध्या (वीरुशुष्मया) वीरेभ्यः शुष्मं बलं यस्याः सकाशात् तया (गोअग्रया) सर्वत्र विभाषा गोः। पा० ६।१।१२२। इति प्रकृतिभावः। गावो धेनवः पृथिवीदेशा वाऽग्रा श्रेष्ठा यस्यां तया (अश्ववत्या) वेगयुक्ततुरङ्गवत्या (सं रभेमहि) ॥