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उ॑द॒प्रुतो॒ न वयो॒ रक्ष॑माणा॒ वाव॑दतो अ॒भ्रिय॑स्येव॒ घोषाः॑। गि॑रि॒भ्रजो॒ नोर्मयो॒ मद॑न्तो॒ बृह॒स्पति॑म॒भ्य॒र्का अ॑नावन् ॥

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उदऽप्रुत: । न । वय: । रक्षमाणा: । वावदत: । अभ्र‍ियस्यऽइव । घोषा: ॥ गिरिऽभ्रज: । न । ऊर्मय: । मदन्त: । बृहस्पतिम्। अभि । अर्का: । अनावन् ॥१६.१॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:16» Paryayah:0» Mantra:1


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

विद्वानों के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (उदप्रुतः) जल को प्राप्त हुए, (रक्षमाणः) अपनी रक्षा करते हुए (वयः न) पक्षियों के समान, (वावदतः) बार-बार गरजते हुए (अभ्रियस्य) बादल के (घोषाः इव) शब्दों के समान, (गिरिभ्रजः) पहाड़ों से गिरते हुए, (मदन्तः) तृप्त करते हुए (ऊर्मयः न) जल के प्रवाहों के समान, (अर्काः) पूजनीय पण्डितों ने (बृहस्पतिम्) बृहस्पति [बड़ी वेदवाणी के रक्षक महाविद्वान्] को (अभि) सब ओर से (अनावन्) सराहा है ॥१॥
Connotation: - जैसे पक्षीगण जलाशय में पा-स्नान करके तृप्त होते हैं, जैसे बरसते हुए मेघ अपनी गर्जन से प्रसन्न करते हैं, और जैसे पहाड़ों से बहती हुई नदियाँ अन्न आदि उत्पन्न करती हैं, वैसे ही बुद्धिमान् लोग वेदाभ्यासी पुरुष के गुणों को गाकर आनन्द बढ़ाते हैं ॥१॥
Footnote: यह सूक्त ऋग्वेद में है-१०।६८।१-१२ ॥ १−(उदप्रुतः) प्रुङ् गतौ-क्विप्। उदकं प्राप्ताः (न) यथा (वयः) पक्षिणः (रक्षमाणाः) आत्मानं पालयन्तः (वावदतः) वदेर्यङ्लुकि शतृ। पुनः पुनः शब्दायमानस्य (अभ्रियस्य) स्वार्थे घप्रत्ययः। अभ्रस्य मेघस्य-निघ० १।१० (इव) यथा (घोषाः) ध्वनयः (गिरिभ्रजः) भ्रशु अधःपतने-क्विप्। शस्य जः। शैलेभ्यः सकाशादधःपतन्तः (न) यथा (ऊर्मयः) जलप्रवाहाः (मदन्तः) तर्पयन्तः (बृहस्पतिम्) बृहत्या वेदवाण्या रक्षकं विद्वांसम् (अभि) सर्वतः (अर्काः) पूजनीयाः पण्डिताः (अनावन्) णु स्तुतौ-लङ्, छान्दसः शप्। अस्तुवन् ॥