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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा और प्रजा के कर्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (अपूर्व्य) हे अनुपम ! [राजन्] (कत् चित्) कुछ भी (स्थूरम्) स्थिर (न) नहीं (भरन्तः) रक्खे हुए, (अवस्यवः) रक्षा चाहनेवाले (वयम्) हम (वाजे) संग्राम के बीच (चित्रम्) विचित्र स्वभाववाले (त्वाम्) तुझको (उ) ही (हवामहे) बुलाते हैं ॥१॥
Connotation: - जब दुष्ट चोर डाकू लोग अत्यन्त सतावें, प्रजागण वीर राजा की शरण लेकर रक्षा करें ॥१॥
Footnote: मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-८।२१।१, २। मन्त्र १ सामवेद में है-पू० ।२।१० तथा मन्त्र १, २ उ० १।१।२२ और मन्त्र १-४ आगे हैं-अथ० २०।६२।१-४ ॥ १−(वयम्) प्रजाः (उ) अवधारणे (त्वाम्) (अपूर्व्य) स्वार्थे यत्। नास्ति पूर्वः श्रेष्ठो यस्मात्, सः, अपूर्वः, अपूर्व्यः। हे अनुपम (स्थूरम्) स्थः किच्च। उ० ।४। ष्ठा गतिनिवृत्तौ-ऊरन्, क्ति। स्थिरम् (न) निषेधे (कच्चित्) किमपि (भरन्तः) धरन्तः (अवस्यवः) अवस-क्यच्, उ। रक्षाकामाः (वाजे) संग्रामे-निघ० २।१७ (चित्रम्) अद्भुतस्वभावम् (हवामहे) आह्वयामः ॥
