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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
गुरुजनों के गुणों का उपदेश।
Word-Meaning: - (यत्) जो [धन] (अन्तरिक्षे) आकाश में, (यत्) जो (दिवि) सूर्य आदि के प्रकाश में और (यत्) जो (पञ्च) पाँच [पृथिवी आदि पाँच तत्त्वों] से संबन्धवाले (मानुषान् अनु) मनुष्यों में है, (अश्विना) हे दोनों अश्वी ! [चतुर माता-पिता] (तत्) उस (नृम्णम्) धन को (धत्त) दान करो ॥२॥
Connotation: - माता-पिता आदि गुरुजन प्रबन्ध करें कि सब लोग आपस में खगोलविद्या, सूर्य, बिजुली, अग्नि आदि विद्याएँ जानकर धनी होवें ॥२॥
Footnote: २−(यत्) धनम् (अन्तरिक्षे) आकाशे (यत्) (दिवि) सूर्यादिप्रकाशे (यत्) (पञ्च) पृथिव्यादिपञ्चभूतसम्बन्धिनः (मानुषान् अनु) लक्षणे अनोः कर्मप्रवचनीयत्वात्। कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया। पा० २।३।८। इति द्वितीया। मनुष्यान् प्रति (नृम्णम्) धनम् (तत्) तादृशम् (धत्त) दत्त (अश्विना) म० १। हे चतुरमातापितरौ ॥
