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इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑। भ॒द्रा हि नः॒ प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ॥

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Pad Path

इमम् । स्तोमम् । अर्हते । जातऽवेदसे । रथम्ऽइव । सम् । महेम । मनीषया ॥ भद्रा । ह‍ि । न: । प्रऽमति: । अस्य । सम्ऽसदि । अग्ने । सख्ये । मा । रिषाम । वयम् । तव ॥१३.२३॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:13» Paryayah:0» Mantra:3


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राजा और विद्वानों के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (अर्हते) योग्य, (जातवेदसे) उत्पन्न पदार्थों के जाननेहारे [पुरुष] के लिये (इमम्) इस (स्तोमम्) गुणकीर्तन को (रथम् इव) रथ के समान (मनीषया) बुद्धि से (सम्) यथावत् (महेम) हम बढ़ावें। (हि) क्योंकि (अस्य) इस [विद्वान्] की (प्रमतिः) उत्तम समझ (संसदि) सभा के बीच (नः) हमारे लिये (भद्रा) कल्याण करनेवाली है। (अग्ने) हे अग्नि ! [तेजस्वी विद्वान्] (ते) तेरी (सख्ये) मित्रता में (वयम्) हम (मा रिषाम) न दुखी होवें ॥३॥
Connotation: - जैसे उत्तम बने हुए यान विमान आदि की चाल और योग्यता से उपकार लेकर मनुष्य गुण गाते हैं, वैसे ही लोग विज्ञान के आविष्कार करनेवाले विद्वान् के गुणों से उपकार लेकर सुख प्राप्त करें ॥३॥
Footnote: यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।९४।१ और सामवेद पू० १।७।४ तथा उ० ४।१।७ ॥ ३−(इमम्) प्रत्यक्षम् (स्तोमम्) गुणकीर्तनम् (अर्हते) योग्याय (जातवेदसे) जातानामुत्पन्नानां वेदित्रे (रथम्) रमणसाधनं विमानादियानम् (इव) यथा (सम्) सम्यक् (महेम) पूजेयम। सत्कुर्याम (मनीषया) प्रज्ञया (भद्रा) कल्याणकारिणी (हि) यतः (नः) अस्मभ्यम् (प्रमतिः) प्रकृष्टा बुद्धिः (अस्य) विदुषः पुरुषस्य (संसदि) परिषदि। सभायाम् (अग्ने) हे तेजस्विन् विद्वन् (सख्ये) मित्रभावे (मा रिषाम) हिंसिता मा भूम (वयम्) (तव) ॥