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सूर्यो॑ दे॒वीमु॒षसं॒ रोच॑मानां॒ मर्यो॒ न योषा॑म॒भ्येति प॒श्चात्। यत्रा॒ नरो॑ देव॒यन्तो॑ यु॒गानि॑ वितन्व॒ते प्रति॑ भ॒द्राय॑ भ॒द्रम् ॥

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Pad Path

सूर्य: । देवीम् । उषसम् । रोचमानाम् । मर्य: । न । योषाम् । अभि । एति । पश्चात् ॥ यत्र । नर: । देवऽयन्त: । युगानि । विऽतन्वते । प्रति । भद्राय । भद्रम् ॥१०७.१५॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:107» Paryayah:0» Mantra:15


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मन्त्र १३-१ परमात्मा और जीवात्मा के विषय का उपदेश।

Word-Meaning: - (सूर्यः) सूर्यमण्डल (देवीम्) देवी [दिव्यगुणवाली] (रोचमानाम्) रुचि करानेवाली (उषसम्) उषा [प्रभात वेला] के (पश्चात्) पीछे-पीछे (अभि) सब ओर से (एति) प्राप्त होता है, (न) जैसे (मर्यः) मनुष्य (योषाम्) अपनी स्त्री को [प्रीति से प्राप्त होता है], (यत्र) जहाँ [संसार के बीच] (देवयन्तः) व्यवहार चाहनेवाले (नरः) नर [नेता लोग] (भद्रम् प्रति) आनन्दस्वरूप परमात्मा के सामने (भद्राय) आनन्द के लिये (युगानि) युगों [वर्षों] को (वितन्वते) फैलाते हैं ॥१॥
Connotation: - जैसे ईश्वरकृत नियमों के अनुसार सूर्य और उषा के सम्बन्ध से प्रकाश, और पुरुष और स्त्री के सम्बन्ध से सन्तान होता है, वैसे ही बुद्धिमान् लोग सुखस्वरूप परमात्मा की आज्ञा में रहकर नियमपूर्वक सुख भोगते हुए अपना जीवनकाल बढ़ावें ॥१॥
Footnote: यह मन्त्र ऋग्वेद में है-१।११।२ ॥ १−(सूर्यः) सविता (देवीम्) दिव्यगुणयुक्ताम् (उषसम्) प्रभातवेलाम्। सन्धिकालम् (रोचमानाम्) रुचिकारिकाम् (मर्यः) पतिर्मनुष्यः (न) इव (योषाम्) स्वभार्याम् (अभि) सर्वतः (एति) प्राप्नोति (पश्चात्) (यत्र) यस्मिन् संसारे (नरः) नेतारः (देवयन्तः) व्यवहारान् कामयमानाः (युगानि) वर्षाणि (वितन्वते) विस्तारयन्ति (प्रति) अभिमुखीकृत्य (भद्राय) कल्याणाय (भद्रम्) सुखस्वरूपं परमात्मानम् ॥