Go To Mantra

तव॒ द्यौरि॑न्द्र॒ पौंस्यं॑ पृथि॒वी व॑र्धति॒ श्रवः॑। त्वामापः॒ पर्व॑तासश्च हिन्विरे ॥

Mantra Audio
Pad Path

तव । द्यौ: । इन्द्र । पौंस्यम् । पृथिवी । वर्धति । श्रव: ॥ त्वाम् । आप: । पर्वतास: । च । हिन्विरे ॥१०६.२॥

Atharvaveda » Kand:20» Sukta:106» Paryayah:0» Mantra:2


Reads 55 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमेश्वर के गुणों का उपदेश।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले परमात्मन्] (तव) तेरे (पौंस्यम्) पुरुषार्थ और (श्रवः) यश को (द्यौः) आकाश और (पृथिवी) पृथिवी (वर्धति) बढ़ाती हैं। (त्वाम्) तुझको (आपः) जलों ने (च) और (पर्वतासः) पहाड़ों ने (हिन्विरे) प्रसन्न किया है ॥२॥
Connotation: - मनुष्य परमेश्वर को उसके बड़े-बड़े कर्मों से जानकर पुरुषार्थ करें ॥२॥
Footnote: २−(तव) (द्यौः) आकाशः (इन्द्र) हे परमेश्वर (पौंस्यम्) पौरुषम् (पृथिवी) (वर्धति) वर्धयति (श्रवः) यशः (त्वाम्) (आपः) जलानि (पर्वतास) शैलाः (च) (हिन्विरे) प्रीणयन्ति स्म ॥