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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ईश्वर की उपासना का उपदेश।
Word-Meaning: - (त्ये) वे (मधुमत्तमाः) अतिमधुर (स्तोमासः) स्तोत्र (उ) और (गिरः) वाणियाँ (उत् ईरते) ऊँची जाती हैं। (इव) जैसे (सत्राजितः) सत्य से जीतनेवाले, (धनसाः) धन देनेवाले, (अक्षितोतयः) अक्षय रक्षा करनेवाले, (वाजयन्तः) बल प्रकट करते हुए (रथाः) रथ [आगे बढ़ते हैं] ॥१॥
Connotation: - जैसे शूर वीरों के रथ रणक्षेत्र में विजय पाने के लिये उमङ्ग से चलते हैं, वैसे ही मनुष्य दोषों और दुष्टों को वश में करने के लिये परमात्मा की स्तुति को बड़े आनन्द से किया करें ॥१॥
Footnote: मन्त्र १, २ ऋग्वेद में है-८।३।१, १६, साम० उ० ६।१।६ और आगे हैं-अ० २०।९।१, २ तथा म० १ साम० पू० ३।६।९ में भी है ॥ १−(उत्) ऊर्ध्वम् (उ) चार्थे (त्ये) ते (मधुमत्तमाः) अतिशयेन मधुराः (गिरः) वाण्यः (स्तोमासः) स्तोत्राणि (ईरते) गच्छन्ति (सत्राजितः) सत्रा सत्यनाम-निघ० ३।१०। सत्रा सत्येन जेतारः (धनसाः) जनसनखनक्रमगमो विट्। पा० ३।२।६७। षण संभक्तौ-विट्। विड्वनोरनुनासिकस्यात्। पा० ६।४।४१। इत्यात्वम्। धनानां संभक्तारः। धनप्रदाः (अक्षितोतयः) अक्षीणरक्षणाः (वाजयन्तः) वाज-क्यच्, शतृ। वाजं बलमिच्छन्तः (रथाः) युद्धयानानि (इव) यथा ॥
