Reads 54 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
राजा के धर्म का उपदेश।
Word-Meaning: - (शपथः) [हमारा] क्रोधवचन (शप्तारम्) कुवचन बोलनेवाले को (एतु) प्राप्त हो और (यः) जो (सुहार्त्) अनुकूल हृदयवाला [शुभचिन्तक] है। (तेन) उस [मित्र] के साथ (नः) हमारा (सह=सहवासः) सहवास हो। (चक्षुर्मन्त्रस्य) आँख से गुप्त बात करनेवाले, (दुर्हार्दः) दुष्टहृदयवाले पुरुष की (पृष्टीः) पसलियों को (अपि) ही (शृणीमसि=०–मः) हम तोड़ डालें ॥५॥
Connotation: - राजा को उचित है कि निन्दकों पर क्रोध और शुभचिन्तक सत्पुरुषों का आदर करे और जो अनिष्टचिन्तक कपटी छली हों, उनको भी दण्ड देता रहे ॥५॥ (चक्षुर्मन्त्रस्य) समासान्त पद को पदपाठ के विरुद्ध सायणाचार्य ने [मन्त्रस्य चक्षुः] दो पद मानकर व्याख्या की है, वह असाधु है। यह समस्त पद (दुर्हार्दः) पद का विशेषण है। इसका प्रयोग अ० १९।४५।१। में इस प्रकार है। चक्षु॑र्मन्त्रस्य दु॒र्हार्दः पृ॒ष्टीरपि॑ शृणाञ्जन ॥ (अञ्जन) हे आँखें खोल देनेवाले ! तू आँख से गुप्त बात करनेवाले दुष्टहृदयवाले की पसलियाँ ही (शृण) तोड़ दे ॥
Footnote: ५–शप्तारम्। शापकर्तारम्। अनीत्या कटुवक्तारम्। एतु। गच्छतु। प्राप्नोतु। शपथः। म० २। आक्रोशः। क्रोधवचनम्। सुहार्त्। हार्दम् आनुकूल्यं करोति हार्दयतीति। हार्दयतेः क्विपि णिलोपे रूपम्। शोभनहृदयः। सुमनस्कः। अनुकूलकारी। तेन। पूर्वोक्तेन। सुहृदयेन मित्रेण। सह। षह क्षमायाम्–अच्। संयोगः। सम्बन्धः। चक्षुर्मन्त्रस्य। चक्षेः शिच्च। उ० २।११९। इति चक्षिङ् कथने दर्शने च–उसि। शित्त्वात् ख्याञादेशाभावः। मत्रि गुप्तभाषणे–अच् घञ् वा। चक्षुषा नेत्रेण मन्त्रो गुप्तभाषणं परामर्शो यस्य तस्य। नेत्रसङ्केतेन विचारशीलस्य पिशुनस्य। दुर्हार्दः। सुहार्त् शब्दवद् व्युत्पत्तिः। दुष्टहृदयस्य। क्रूरपुरुषस्य। पृष्टीः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।६४।१७४। इति पृषु सेचने–क्तिच्। पर्श्वस्थीनि। पार्श्वावयवान्। शृणीमसि। शॄ हिंसायाम्। इदन्तो मसिः। पा० ७।१।६४। इति इकारः। शृणीमः। विनाशयामः ॥
