मनुष्य सदैव उन्नति का उपाय करता रहे।
Word-Meaning: - (वृषायमाणः) ऐश्वर्यवाले के समान आचरण करते हुए पुरुष ने (सुतस्य) उत्पन्न संसार के (त्निकद्रुकेषु) तीन आवहनों [उत्पत्ति, स्थिति और विनाश, अथवा, शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति के विधानों] के निमित्तों में (सोमम्) ऐश्वर्य वा अमृत रस [कीर्त्ति] को (अवृणीत) अङ्गीकार किया और (अपिबत्) पान किया [आत्मा में दृढ़ किया]। (मघवा) उस पूजनीय पुरुष ने (सायकम्) काटनेवाले वाण वा खड्ग और (वज्रम्) वज्र हथियार को (आ अदत्त) लिया और (अहीनाम्) बड़े घातकों [प्रकाशनाशक] मेघ वा सर्परूप असुरों के बीच (प्रथमजाम्) प्रधानता से प्रसिद्ध अर्थात् अग्रगामी (एनम्) इस [समीपस्थ अर्थात् आत्मा में स्थित दुष्ट] को (अहन्) मार डाला ॥७॥
Connotation: - इस सूक्त के तीन मन्त्रों में ५–७ (इन्द्र) का (अहि) के मारकर उन्नति करने का वर्णन है और मन्त्र ७ में (त्रिकद्रुकेषु) पद तीन आवाहनों का द्योतक है। इसका प्रयोजन यह है कि जैसे तपस्वी, धैर्यवान्, शूरवीर पुरुषों ने जितेन्द्रिय वशिष्ठ होकर अपने आत्मिक, कायिक और सामाजिक शत्रु कुक्रोध आदि को मारा, उन्होंने ही संसार की वृद्धि, पालन और नाश के कारण को खोजा और तीन प्रकार की आत्मिक, शारीरिक और सामाजिक उन्नति करके अमर अर्थात् महाकीर्त्तिमान् हुए, इसी प्रकार सब स्त्री-पुरुष जितेन्द्रिय होकर संसार में उन्नति करके कीर्त्ति पाकर अमर हों और आनन्द भोगें ॥७॥ इति प्रथमोनुवाकः ॥