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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
मनुष्य सदैव उन्नति का उपाय करता रहे।
Word-Meaning: - (इन्द्र) हे परम ऐश्वर्यवाले राजन् ! (जुषस्व) तू प्रसन्न हो, (प्र वह) आगे बढ़, (शूर) हे शूर ! (हरिभ्याम्) हरणशील दिन और रात अथवा प्राण और अपान के हित के लिये (आ याहि) तू आ। (चारुः) मनोहर स्वभाववाला, (मदाय) हर्ष के लिये (चकानः) तृप्त होता हुआ तू, (इह) यहाँ पर (मतेः) बुद्धिमान् पुरुष के (सुतस्य) निचोड़ के (मधोः) मधुर रस का (पिब) पान कर ॥१॥
Connotation: - राजा को योग्य है कि सदा प्रसन्न रहकर उन्नति करे और करावे और सबके (हरिभ्याम्) दिन और रात अर्थात् समय को और प्राण और अपानवायु अर्थात् जीवन को परोपकार में लगावे और बुद्धिमानों के ज्ञान के सारांश [निचोड़] के रस का ग्रहण करके आनन्द भोगे ॥१॥ म० १–३, सामवेद उत्तरार्चिक प्रपाठक ३, अर्धप्रपाठक १ तृच २२ में कुछ भेद से हैं ॥
Footnote: १–इन्द्र। अ० १।२।३। इदि परमैश्वर्ये–रन्। हे परमैश्वर्यवन् राजन् ! मनुष्य। जुषस्व। जुषी प्रीतिसेवनयोः–लोट्। प्रीयस्व। हृष्टो भव। प्रवह। प्रगच्छ। शूर। शुचिचिमीनां दीर्घश्च। उ० २।२५। इति शु गतौ–क्रन्। शवति वीर्य्यं प्राप्नोतीति। यद्वा, शूर विक्रमे उद्यमे–अच्। हे वीर ! हरिभ्याम्। हृपिषिरुहिवृति०। उ० ४।११९। इति हृञ् हरणे–इन्। हरणं प्रापणं स्वीकारः स्तेयं नाशनं च। हरतीति हरिः सूर्यः, चन्द्रः, वायुः, इति कोपे। द्विवचनत्वात् सूर्यचन्द्राभ्याम् तयोरुपलक्षितदिनरात्रिहिताय। अथवा, वायुभ्याम् प्राणापानाभ्यां तयोरुपलक्षितजीवनहिताय। हरिभ्यां हरणसाधनाभ्यामहोरात्राभ्यां कृष्णशुक्लपक्षाभ्याम्–इति श्रीमद्दयानन्दभाष्ये, ऋ १।३५।३। सुतस्य। षुञ् अभिषवे, यद्वा, षु प्रसवैश्वर्ययोः–क्त। अभिषवस्य, सारस्य ऐश्वर्यस्य। मतेः। क्तिच्क्तौ च संज्ञायाम्। पा० ३।३।१७४। इति मन् बोधे–क्तिच्। मतयः, मेधाविनामसु–निघ० ३।१५। मेधाविनः पुरुषस्य। मधोः। मधुररसस्य। चकानः। चक तृप्तौ–शानच्। तृप्तिकामः। चारुः। दृसनिजनिचरिचटिरहिभ्यो ञुण्। उ० १।३। इति चर गतौ–ञुण्। शोभनस्वभावः, मनोज्ञः ॥
