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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
विवाह संस्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे कन्या !] (भगस्य) ऐश्वर्य की (पूर्णाम्) भरी-भरायी और (अनुपदस्वतीम्) अटूट (नावम्) नाव पर (आ रोह) चढ़। और (तया) उस [नाव] से [अपने वर को] (उप प्रतारय) आदरपूर्वक पार लगा, (यः) जो (वरः) वर (प्रति–काम्यः) प्रतिज्ञा करके चाहने [प्रीति करने] योग्य है ॥५॥
Connotation: - इस मन्त्र में गृहपत्नी की भारी उत्तरदातृता [ज़िम्मेदारी] का वर्णन है। जैसे नाविक खान-पान आदि आवश्यक सामग्री से लदी-लदायी और बड़ी दृढ़ नौका से जलयात्रियों को समुद्र से पार लगाता है, वैसे ही गृहपत्नी अपने घर को धन-धान्य आदि ऐश्वर्य से भरपूर और दृढ़ रक्खे और पति को नियम में बाँधकर पूरे प्रेम से प्रसन्न रखकर गृहस्थाश्रम से पार लगावे ॥५॥
Footnote: ५–भगस्य। भजनीयस्य। ऐश्वर्यस्य। नावम्। ग्लानुदिभ्यां डौः। उ० २।६४। इति णुद प्रेरणे–डौ। नुद्यते जले सा नौः। समुद्रादिसन्तरणार्थयानविशेषम्। पोतम्। समुद्रयानम्। गृहस्थाश्रमरूपम्। आरोह। अधितिष्ठा आरुढा भव। पूर्णाम्। पॄ पूर वा पूर्त्तौ–क्त, तस्य नः। पूरिताम्। कृतपूरणाम्। अनुपदस्वतीम्। अन्+उप+दसु उपक्षये–क्विप्। मतुप्, मस्य वः। अखण्डिताम्। अक्षीणाम्। तया। नावा। उपप्रतारय। उप पूजया शक्त्या वा पारय। यः। पूर्वोक्तः। वरः। ॠदोरप्। पा० ३।३।५७। इति वृञ् वरणे–अप्। वरणीयः। श्रेष्ठः पतिः। जामाता प्रतिकाम्यः। कमु स्पृहि–णिच्, कर्मणि यत् प्रति निश्चयेन प्रतिज्ञया कमनीयः कामनायोग्यः ॥
