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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
बुद्धि से विवाद करे, इसका उपदेश।
Word-Meaning: - (इन्द्रः) बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष ने (पाटाम्) चमकती हुयी [ओषधिरूप बुद्धि] को (असुरेभ्यः) असुरों से (स्तरीतवे) रक्षा के लिये (वि) विविध प्रकार से (आश्नात्) भोजन किया है। (प्राशम्) मुझ वादी के (प्रतिप्राशः) प्रतिवादियों को (जहि) मिटा दे, (ओषधे) हे ताप को पी लेनेवाली [ओषधि के समान बुद्धि ! उन सबको] (अरसान्) फींका (कृणु) कर ॥४॥
Connotation: - जैसे उत्तम ओषधि के सेवन से रोग का नाश होकर शरीर और चित्त को आनन्द मिलता है, वैसे ही ऐश्वर्यशाली पुरुष बुद्धि के यथावत् प्रयोग से शत्रुओं का नाश करके शान्ति लाभ करते हैं ॥४॥ तीनों संहिताओं के (पाटाम्) पद के स्थान पर सायणभाष्य में (पाठाम्) है और भाष्यकार ने उसे ओषधिविशेष माना है। शब्दकल्पद्रुम कोष में लिखा है कि [पाठा] लताविशेष है, आकनादि भाषा नाम है। उसके गुण तिक्तता, गुरुता, उष्णता और वातपित्त, ज्वरपित्त, दाह, अतीसार, शूलनाशन आदि हैं ॥
Footnote: ४–पाटाम्। पट गतिदीप्तिवेष्टनेषु–घञ्, टाप्। गतिम्। दीप्तिम्। विद्याम्। ओषधिम्। प्रसङ्गात् सायणभाष्योक्तम् [पाठा] इति पदं व्याख्यायते तद् यथा शब्दकल्पद्रुमकोषे। पठ्यते बहुगुणवत्तया कथ्यते इति। पठ–कर्मणि घञ्, अजादित्वात् टाप्, लताविशेषः, आकनादि इति भाषा, तत्पर्यायः प्राचीना, दीपनी...., अस्या गुणाः, तिक्तत्वम्, गुरुत्वम्, उष्णत्वम्, वातपित्तज्वरपित्तदाहातीसार- शूलनाशित्वम्, भग्नसन्धानकारित्वं च। वि। विविधम्। आश्नात्। अश भोजने–लङ्। अभक्षयत्। अन्यद् व्याख्यातम् ॥
