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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
ब्रह्मचारी के समावर्त्तन, विद्यासमाप्ति पर वस्त्र आदि के लिये उपदेश।
Word-Meaning: - [हे ब्रह्मचारिन्] (एहि=आ+इहि) तू आ, (अश्मानम्) इस शिला पर (आ+तिष्ठ) चढ़, (ते) तेरा (तनूः) तन [शरीर] (अश्मा) शिला [शिला जैसा दृढ़] (भवतु) होवे। (विश्वे) सब (देवाः) उत्तम गुणवाले [पुरुष और पदार्थ] (ते) तेरी (आयुः) आयु को (शतम्) सौ (शरदः) शरद् ऋतुओं तक (कृण्वन्तु) [दीर्घ] करें ॥४॥
Connotation: - ब्रह्मचारी को शिक्षा दें कि वह यथानियम पथ्यसेवन, व्यायाम, ब्रह्मचर्य और पौरुष करके अपने शरीर को दृढ़ और स्वस्थ रक्खे और विद्वानों के मेल और उत्तम पदार्थों के सेवन से पूर्ण आयु भोगकर संसार में उपकार करे ॥४॥ अथर्ववेद १।२।२। में आया है(अश्मानं तन्वं कृधि) शरीर को पत्थर सा दृढ़ बना॥
Footnote: ४–आ+इहि। आगच्छ। अश्मानम्। अ० १।२।२। प्रस्तरम्। अश्मा। पाषाणशिला। पाषाणवद्दृढा। आ+तिष्ठ। अधितिष्ठ। आरूढो भव। तनूः। तनु विस्तारे–ऊ। शरीरम्। कृण्वन्तु। कुर्वन्तु। विश्वे। सर्वे। देवाः। दिव्यगुणाः पुरुषाः पदार्था वा। आयुः। म० २। जीवनम्। ते। तव। युष्मत्तत्ततक्षुष्वन्तःपादम्। पा० ८।३।१०३। इति सकारस्य षत्वम्। शरदः। शरदृतून्। संवत्सरान्। शतम्। बह्वीः। बहुसंवत्सरान् ॥
