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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे पुरुष !] तू (दूष्याः) दूषित क्रिया का (दूषिः) खण्डनकर्ता (असि) है और (हेत्याः) बरछी का (हेतिः) बरछी (असि) है, (मेन्याः) वज्र का (मेनिः) वज्र (असि) है। (श्रेयांसम्) अधिक गुणी [परमेश्वर वा मनुष्य] को (आप्नुहि) तू प्राप्त कर, (समम्) तुल्यबलवाले [मनुष्य] से (अति=अतीत्य) बढ़कर (क्राम) पद आगे बढ़ा ॥१॥
Connotation: - परमेश्वर ने मनुष्य को बड़ी शक्ति दी है। जो पुरुष उन शक्तियों को परमेश्वर के विचार और अधिक गुणवालों के सत्सङ्ग से, काम में लाते हैं, वे निर्विघ्न होकर अन्य पुरुषों से अधिक उपकारी होकर आनन्द भोगते हैं ॥१॥
Footnote: १–दूष्याः। अ० १।२३।४। दुष दुष्टकर्मणि–इन्। दुष्टक्रियायाः। दूषिः। दूषकः, निवारकः–इति सायणोऽपि। असि। भवसि। हेत्याः। ऊतियूतिजूतिसातिहेतिकीर्तयश्च पा० ३।३।९७। इति हन हिंसागत्योः, यद्वा, हि गतिवृद्ध्योः–क्तिनि हन्तेर्नकारस्येत्वम्, हिनोतेर्गुणश्च निपात्यते। हेतिर्वज्रनाम–निघ० २।२०। वज्रस्य। आयुधस्य। हेतिः। अस्त्रम्। मेन्याः। वीज्याज्वरिभ्यो निः। उ० ४।४८। इति मिञ् हिंसायाम्–नि। मेनिर्वज्रनाम–निघ० २।२०। वज्रस्य। मेनिः। वज्रः। आप्नुहि। प्राप्नुहि। श्रेयांसम्। द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ। पा० ५।३।५७। इति प्रशस्य–ईयसुन्। प्रशस्यस्य श्रः। पा० ५।३।६०। इति प्रशस्यस्य श्र इत्यादेशः। प्रशस्यतरम्। अधिकगुणवन्तं पुरुषं परमात्मानं मनुष्यं वा। अति। अतीत्य। उल्लङ्घ्य। समम्। समानम्। तुल्यबलिनम्। क्राम। क्रमु पादविक्षेपे–लोट्। अग्रे गच्छ ॥
