ब्रह्म के मिलने का उपदेश।
Word-Meaning: - (सद्यः) अभी (द्यावापृथिवी=०–व्यौ) सूर्य और पृथिवीलोक में (परि=परीत्य) घूमता हुआ (आयम्) मैं [प्राणी] आया हूँ (ऋतस्य) सत्यनियम के (प्रथमजाम्) पहिले से उत्पन्न करनेवाले [परमेश्वर] को (उप+आतिष्ठे) मैं प्राप्त होता हूँ, (इव) जैसे [श्रोता गण] (वक्तरि) वक्ता में [वर्त्तमान] (वाचम्) वाणी को [प्राप्त होते हैं।] (भुवनेष्ठाः) सम्पूर्ण जगत् में स्थित (एषः) यह परमेश्वर (धास्युः) पोषण करनेवाला और (ननु) अवश्य करके (एषः) यह (अग्निः) अग्नि [सदृश उपकारी वा व्यापक परमात्मा] है ॥४॥
Connotation: - तत्त्ववेत्ता पुरुष सूर्य और पृथिवी आदि प्रत्येक कार्यरूप पदार्थ के आकर्षण, धारणादि का यथार्थज्ञान प्राप्त करके परमात्मा को साक्षात् करता है, जैसे श्रोता लोग वक्ता के बोलने पर उसकी वाणी के अभिप्राय को अपने आत्मा में ग्रहण करते हैं। वही ईश्वर वेदरूप सत्यनियम की सृष्टि के पहिले प्रकट करता और सब जगत् का धारण और पोषण करता रहता है, जैसे सूर्य का ताप अन्न आदि को परिपक्व करके और जाठर अग्नि भोजन को पचाकर और उससे रुधिर आदि को उत्पन्न करके शरीर को पुष्ट करता है ॥४॥ पातञ्जल योगदर्शन में वर्णन है–पाद ३ सूत्र २५। भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात् ॥ सूर्य में संयम से लोकों का ज्ञान [योगी को] होता है। अर्थात् वह सूर्य को केन्द्र मानकर सूर्य से लोकों का सम्बन्ध और परमेश्वर से सूर्य का सम्बन्ध अपनी विद्या द्वारा जान लेता है ॥