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वि॒राडग्रे॒ सम॑भवद्वि॒राजो॒ अधि॒ पूरु॑षः। स जा॒तो अत्य॑रिच्यत प॒श्चाद्भूमि॒मथो॑ पु॒रः ॥

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Pad Path

विऽराट्। अग्ने। सम्। अभवत्। विऽराजः। अधि। पुरुषः। सः। जातः। अति। अरिच्यत। पश्चात्। भूमिम्। अथो इति। पुरः ॥६.९॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:6» Paryayah:0» Mantra:9


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सृष्टिविद्या का उपदेश।

Word-Meaning: - (अग्रे) पहिले [सृष्टि की आदि में] (विराट्) विराट् [विविध पदार्थों से विराजमान ब्रह्माण्ड] (सम्) यथाविधि (अभवत्) हुआ, (विराजः) विराट् [उस ब्रह्माण्ड] से (अधि) ऊपर [अधिष्ठाता होकर] (पुरुषः) पुरुष [पूर्ण परमात्मा] [प्रकट हुआ]। (सः) वह [पुरुष] (जातः) प्रकट होकर (भूमिम्) भूमि [अर्थात् सब सृष्टि से] (पश्चात्) पीछे को (अथो) और भी (पुरः) आगे को (अति) लाँघकर (अरिच्यत) बढ़ गया ॥९॥
Connotation: - परमात्मा ही इस सब विद्यमान सृष्टि का अधिष्ठाता है, वह अनादि अनन्त पुरुष सृष्टि के पीछे और पहिले भी विराजमान रहता है ॥९॥
Footnote: यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।९०।५, यजुर्वेद−३१।५, साम० पू० ६।१३।७ ॥ ९−(विराट्) विविधैः पदार्थै राजते प्रकाशते स विराड् ब्रह्माण्डरूपः संसारः (अग्रे) सृष्ट्यादौ (सम्) सम्यक् (अभवत्) (विराजः) तस्माद् ब्रह्माण्डात् (अधि) उपरि। अधिष्ठाता सन् (पुरुषः) पूर्णः परमात्मा (सः) पुरुषः (जातः) प्रादुर्भूतः (अति) अतीत्य। उल्लङ्घ्य (अरिच्यत) अधिकोऽभवत् (पश्चात्) सृष्टिपश्चात् (भूमिम्) सर्वसृष्टिम् (अथो) अपि च (पुरः) पुरस्तात्। सृष्टिपूर्वम् ॥