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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
सृष्टिविद्या का उपदेश।
Word-Meaning: - (यत्) जब कि (यज्ञम्) [संसार रूप] यज्ञ को (तन्वानाः) फैलाये हुए (देवाः) विद्वानों ने (पशुम्) दर्शनीय (पुरुषम्) पुरुष [पूर्ण परमात्मा] को (अबध्नन्) [हृदय में] बाँधा, [तब] (सप्त) सात [तीन काल, तीन लोक अर्थात् सृष्टि स्थिति और प्रलय और एक जीवात्मा] (अस्य) इस [संसार रूप यज्ञ] के (परिधयः) घेरे समान (आसन्) थे, और (त्रिःसप्त) तीन बार सात [इक्कीस अर्थात् पाँच सूक्ष्म भूत, पाँच स्थूल भूत, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय और एक अन्तःकरण] (समिधः) समिधाएँ [काष्ठ घृत आदि के समान] (कृताः) किये गये ॥१५॥
Connotation: - जब विद्वान् लोग परमात्मा का ध्यान करते हुए संसार को यज्ञसमान मानें, तो जैसे यज्ञ के लिये वेदी वा हवनकुण्ड और काष्ठ घृत आदि सामग्री आवश्यक हैं, वैसे ही संसार में सृष्टि के लिये मन्त्रोक्त काल आदि सब पदार्थ आवश्यक होते हैं ॥१५॥
Footnote: यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।९०।१५। और यजुर्वेद ३१।१५ ॥ १५−(सप्त) कालत्रयेण, लोकत्रयेण अर्थात् सृष्टिस्थितिप्रलयेन सह जीवात्मा (अस्य) यज्ञस्य (आसन्) (परिधयः) परितः सर्वतो धीयन्ते ये ते। गोलमण्डलस्य परितो वेष्टनरूपाः (त्रिःसप्त) त्रिवारं सप्त, एकविंशतिसंख्याकाः। पञ्च सूक्ष्मभूतानि पञ्च स्थूलभूतानि, पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि, पञ्च कर्मेन्द्रियाणि, एकमन्तःकरणं चेति (समिधः) काष्ठघृतादिसामग्रीभूताः (कृताः) निष्पादिताः (देवाः) विद्वांसः (यत्) यदा (यज्ञम्) संसाररूपं यज्ञम् (तन्वानाः) विस्तृणन्तः (अबध्नन्) मनसि धारितवन्तः (पुरुषम्) पूर्णं परमात्मानम् (पशुम्) दर्शनीयम् ॥
