Go To Mantra

तस्मा॑द्य॒ज्ञात्स॑र्व॒हुतः॒ संभृ॑तं पृषदा॒ज्यम्। प॒शूंस्तांश्च॑क्रे वाय॒व्यानार॒ण्या ग्रा॒म्याश्च॒ ये ॥

Mantra Audio
Pad Path

तस्मात्। यज्ञात्। सर्वऽहुतः। सम्ऽभृतम्। पृषत्ऽआज्यम्। पशून्। तान्। चक्रे। वायव्यान्। आरण्याः। ग्राम्याः। च। ये ॥६.१४॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:6» Paryayah:0» Mantra:14


Reads 61 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सृष्टिविद्या का उपदेश।

Word-Meaning: - (तस्मात्) उस (यज्ञात्) पूजनीय (सर्वहुतः) सब के दानी [अन्न आदि के देनेहारे] [पुरुष परमात्मा] से (पृषदाज्यम्) दही, घी [आदि भोग्य पदार्थ] (संभृतम्) सिद्ध किया गया है। उसने (तान्) उन (पशून्) जीवों [दोपायों, चौपायों] और (वायव्यान्) पवन में रहनेवाले [पक्षी आदियों] को (चक्रे) बनाया, (ये) जो (आरण्याः) वनैले (च) और (ग्राम्याः) ग्राम के रहनेवाले हैं ॥१४॥
Connotation: - जिस परमात्मा ने जगत् के हित के लिये सब भोग्य पदार्थ और सब वनैले और घरेलू जीव, जैसे मनुष्य, सिंह, बाघ, गाय, बैल तथा गिद्ध, चील, तोता, मैना, कीट, पतङ्ग आदि बनाये हैं, सब लोग उसकी उपासना से आत्मोन्नति करें ॥१४॥
Footnote: यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।९०।८ और यजुर्वेद−३१।६ ॥ १४−(तस्मात्) पूर्वोक्तात् पुरुषात् (यज्ञात्) पूजनीयात् (सर्वहुतः) म० १३। सर्वेभ्योऽन्नादिदातुः सकाशात् (संभृतम्) सम्यग् धारितं सम्पादितम् (पृषदाज्यम्) दधिघृतादिभोग्यं वस्तु (पशून्) द्विपदश्चतुष्पदो जीवान् (चक्रे) जनयामास (वायव्यान्) वाय्वृतुपित्रुषसो यत्। पा० ४।२।३१। वायु−यत्। वायुदेवताकान्। वायुभवान् (आरण्याः) अरण्य-अण्। अरण्ये भवाः (ग्राम्याः) ग्रामाद्यखञौ। पा० ४।२।९४। ग्राम−य प्रत्ययः। ग्रामे भवाः (च) (ये) ॥