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यस्य॑ क्रू॒रमभ॑जन्त दु॒ष्कृतो॒ऽस्वप्ने॑न सु॒कृतः॒ पुण्य॒मायुः॑। स्वर्मदसि पर॒मेण॑ ब॒न्धुना॑ त॒प्यमा॑नस्य॒ मन॒सोऽधि॑ जज्ञिषे ॥
Pad Path
यस्य। क्रूरम्। अभजन्त। दुःऽकृतः। अस्वप्नेन। सुऽकृतः। पुण्यम्। आयुः। स्वः। मदसि। परमेण। बन्धुना। तप्यमानस्य। मनसः। अधि। जज्ञिषे ॥५६.५॥
Atharvaveda » Kand:19» Sukta:56» Paryayah:0» Mantra:5
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
निद्रा त्याग का उपदेश।
Word-Meaning: - (दुष्कृतः) दुष्कर्मियों ने (यस्य) जिस [स्वप्न] के (क्रूरम्) क्रूर [निर्दय] कर्म को (अभजन्त) भोगा है, और (अस्वप्नेन) स्वप्नत्याग से (सुकृतः) सुकर्मियों ने (पुण्यम्) पवित्र (आयुः) जीवन [भोगा] है। [हे स्वप्न !] (स्वः) सुख में [वर्तमान] (परमेण) परम (बन्धुना) बन्धु [पुरुष] के साथ (मदसि) तू जड़ हो जाता है, और (तप्यमानस्य) सन्ताप को प्राप्त हुए [थके पुरुष] के (मनसः अधि) मन में से (जज्ञिषे) तू प्रकट हुआ है ॥५॥
Connotation: - दुष्ट लोग स्वप्न वा आलस्य के कारण महाकष्ट उठाते हैं, और पुण्यात्मा उसके त्याग से आनन्द उठाते हैं। सर्वहितैषी पुरुषार्थी लोगों में उसका प्रभाव नहीं होता, वह पुरुषार्थहीन थके लोगों में प्रभाव जमाता है ॥५॥
Footnote: ५−(यस्य) (क्रूरम्) निर्दयं कर्म (अभजन्त) असेवन्त (दुष्कृतः) दुष्कर्माणः पापिनः (अस्वप्नेन) स्वप्नत्यागेन (सुकृतः) पुण्यकर्माणः (पुण्यम्) पवित्रम् (आयुः) जीवनम्, अभजन्त इत्यनुवर्तते (स्वः) सुखे वर्तमानेन (मदसि) मद जाड्ये। जडो मूढो भवसि (परमेण) सर्वोत्कृष्टेन (बन्धुना) बान्धवेन (तप्यमानस्य) सन्तप्यमानस्य। श्रान्तस्य पुरुषस्य (मनसः) अन्तःकरणस्य (अधि) अधिकम् (जज्ञिषे) प्रादुर्बभूविथ ॥
