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बृह॒स्पतिं॒ ते वि॒श्वदे॑ववन्तमृच्छन्तु। ये मा॑ऽघा॒यव॑ ऊ॒र्ध्वाया॑ दि॒शोऽभि॒दासा॑त् ॥

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बृहस्पतिम्। ते। विश्वदेवऽवन्तम्। ऋच्छन्तु। ये। मा। अघऽयवः। ऊर्ध्वायाः। दिशः। अभिऽदासात् ॥१८.१०॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:18» Paryayah:0» Mantra:10


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

रक्षा के प्रयत्न का उपदेश।

Word-Meaning: - (ते) वे [दुष्ट] विश्वदेववन्तम् सब उत्तम गुण रखनेवाले (बृहस्पतिम्)। बृहस्पति [वेदवाणी के रक्षक परमात्मा] की (ऋच्छन्तु) सेवा करें। (ये) जो (अघायवः) बुरा चीतनेवाले (मा) मुझे (ऊर्ध्वायाः) ऊपरवाली (दिशः) दिशा से (अभिदासात्) सताया करें ॥१०॥
Connotation: - मन्त्र १ के समान है ॥१०॥
Footnote: १०−(बृहस्पतिम्) बृहत्या वेदवाण्या रक्षकं परमात्मानम् (विश्वदेववन्तम्) सर्वश्रेष्ठगुणयुक्तम् (ऊर्ध्वायाः) उपरिस्थितायाः। अन्यत् पूर्ववत् ॥