Go To Mantra

यत॑ इन्द्र॒ भया॑महे॒ ततो॑ नो॒ अभ॑यं कृधि। मघ॑वञ्छ॒ग्धि तव॒ त्वं न॑ ऊ॒तिभि॒र्वि द्विषो॒ वि मृधो॑ जहि ॥

Mantra Audio
Pad Path

यतः। इन्द्र। भयामहे। ततः। नः। अभयम्। कृधि। मघऽवन्। शग्धि। तव। त्वम्। नः। ऊतिऽभिः। वि। द्विषः। वि। मृधः। जहि ॥१५.१॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:15» Paryayah:0» Mantra:1


Reads 84 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

राजा के कर्त्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (इन्द्र) हे इन्द्र ! [बड़े ऐश्वर्यवाले राजन्] (यतः) जिससे (भयामहे) हम डरते हैं, (ततः) उससे (नः) हमें (अभयम्) अभय (कृधि) करदे। (मघवन्) हे महाधनी ! (त्वम्) तू (तव) अपनी (ऊतिभिः) रक्षाओं से (नः) हमें (शग्धि) शक्ति दे, (द्विषः) द्वेषियों को और (मृधः) सङ्ग्रामों को (वि) विशेष करके (विजहि) विनाश करदे ॥१॥
Connotation: - राजा को चाहिये कि प्रजा को जिन शत्रुओं से भय हो, उनको नाश करके प्रजा में शान्ति स्थापित करे ॥१॥
Footnote: यह मन्त्र ऋग्वेद में है-८।६१ [वा सायणभाष्य ५०]।१३, साम० पू०३।९।२ तथा उ०५।२।१५॥१−(यतः) यस्मात् कारणात् (इन्द्र) हे परमैश्वर्यवन् राजन् (भयामहे) बिभीमः (ततः) तस्मात् कारणात् (नः) अस्मभ्यम् (अभयम्) भयराहित्यम् (कृधि) कुरु (मघवन्) हे बहुधनवन् (शग्धि) शकेर्लोट् शक्तिं देहि (तव) स्वकीयाभिः (त्वम्) (नः) अस्मभ्यम् (ऊतिभिः) रक्षाभिः (वि) विशेषेण (द्विषः) द्वेष्टॄन्। द्रोहिणः (मृधः) संग्रामान्-निघ०२।१७। (वि जहि) विनाशय ॥