Go To Mantra

बृह॑स्पते॒ परि॑ दीया॒ रथे॑न रक्षो॒हामित्राँ॑ अप॒बाध॑मानः। प्र॑भ॒ञ्जञ्छत्रू॑न्प्रमृ॒णन्न॒मित्रा॑न॒स्माक॑मेध्यवि॒ता त॒नूना॑म् ॥

Mantra Audio
Pad Path

बृहस्पते। परि। दीय। रथेन। रक्षःऽहा। अमित्रान्। अपऽबाधमानः। प्रऽभञ्जन्। शत्रून्। प्रऽमृणन्। अमित्रान्। अस्माकम्। एधि। अविता। तनूनाम् ॥१३.८॥

Atharvaveda » Kand:19» Sukta:13» Paryayah:0» Mantra:8


Reads 53 times

PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सेनापति के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (बृहस्पते) हे बृहस्पति ! [बड़े-बड़े पुरुषों के रक्षक] (रक्षोहा) राक्षसों [दुष्टों] का मारनेवाला, (अमित्रान्) अमित्रों [वैरियों] को (अपबाधमानः) हटा देनेवाला होकर (रथेन) रथसमूह से (परि) सब ओर से (दीय) नाश कर। (शत्रून्) शत्रुओं को (प्रभञ्जन्) कुचलता हुआ और (अमित्रान्) अमित्रों को (प्रमृणन्) मार डालता हुआ तू (अस्माकम्) हमारे (तनूनाम्) शरीरों का (अविता) रक्षक (एधि) हो ॥८॥
Connotation: - अनुभवी योद्धाओं को उत्साह देने, वैरियों को मारने और प्रजा के बचाने में योग्य पुरुष ही सेनापति होवे ॥८॥
Footnote: यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१०३।४। यजु०१७।३६ और साम०-उ०९।३।२॥८−(बृहस्पते) हे बृहतां महतां पुरुषाणां रक्षक (परि) सर्वतः (दीय) दीङ् क्षये, छान्दसो दीर्घः। नाशय (रथेन) युद्धरथसमूहेन (रक्षोहाः) रक्षसां दुष्टानां हन्ता (अमित्रान्) अमेर्द्विषति चित्। उ०४।१७४। अम पीडने-इत्र, चित्। पीडकान्। शत्रून् (अपबाधमानः) निवारयन् सन् (प्रभञ्जन्) प्रकर्षेण मर्दयन् (शत्रून्) (प्रमृणन्) अतिशयेन मारयन् (अमित्रान्) (अस्माकम्) (एधि) भव (अविता) रक्षकः (तनूनाम्) शरीराणाम् ॥