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उ॒षा अप॒ स्वसु॒स्तमः॒ सं व॑र्तयति वर्त॒निं सु॑जा॒तता॑। अ॒या वाजं॑ दे॒वहि॑तं सनेम॒ मदे॑म श॒तहि॑माः सु॒वीराः॑ ॥

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उषाः। अप। स्वसुः। तमः। सम्। वर्तयति। वर्तनिम्। सुऽजातता। अया। वाजम्। देवऽहितम्। सनेम। मदेम। शतऽहिमाः। सुऽवीराः ॥१२.१॥

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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मनुष्य के कर्तव्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (उषाः) प्रभात वेला (स्वसुः) [अपनी] बहिन [रात्रि] के (तमः) अन्धकार को (अप=अपवर्तयति) हटा देती है, और (सुजातता) [अपनी] भलमनसाहत से (वर्तनिम्) [उसके लिये] मार्ग (सम्) मिलकर (वर्तयति) बता देती है। (अया) इस [नीति] से (शतहिमाः) सौ वर्ष जीवते हुए और (सुवीराः) सुन्दर वीरों को रखते हुए हम (देवहितम्) विद्वानों के हितकारी (वाजम्) विज्ञान को (सनेम) बाँटें और (मदेम) आनन्द करें ॥१॥
Connotation: - पृथिवी की गोलाई के कारण आधे भूगोल में एक साथ प्रकाश करने से उषा रात्रि को हटाकर जितनी आगे बढ़ती है, उतना ही स्थान रात्रि को पीछे से देती चलती है और दोनों प्रीतिपूर्वक मिलकर जगत् का उपकार करती हैं, इसी प्रकार सब मनुष्य ज्ञान के प्रचार से परस्पर उपकार करके बड़े-बड़े धैर्यवान् बलवानों सहित पूर्ण आयु भोगें ॥१॥
Footnote: इस मन्त्र का पूर्वार्द्ध ऋग्वेद में है १०।१७२।४। और उत्तरार्द्ध ऋग्० ६।१७।१५ और सामवेद पू० ५।७।७ ॥ १−(उषाः) प्रभातवेला (अप) अपवर्तयति। निवारयति (स्वसुः) भगिन्या रात्रेः (तमः) अन्धकारम् (सम्) परस्परम् (वर्तयति) प्रवर्तयति। प्रसारयति (वर्तनिम्) वृतेश्च। उ० २।—१०६। वृतु वर्तने-अनि। मार्गम् (सुजातता) सुजाततया। श्रेष्ठगुणवत्वेन (अया) अनया नीत्या (वाजम्) विज्ञानम् (देवहितम्) विद्वद्भ्यो हितकरम् (सनेम) विभजेम (मदेम) आनन्देम (शतहिमाः) शतवर्षजीविनः (सुवीराः) उत्तमवीरयुक्ताः ॥