सत्य मार्ग पर चलने का उपदेश।
Word-Meaning: - (तीर्थैः) तरने केसाधनों [शास्त्रों वा घाटों आदि] द्वारा [मनुष्य] (प्रयतः) बहुत गतियोंवाली (महीः) बड़ी [विपत्तियों वा नदियों] को [उस प्रकार से] (तरन्ति) पार करते हैं, (येन) जिससे (यज्ञकृतः) यज्ञ करनेवाले, (सुकृतः) सुकर्मी लोग (यन्ति) चलतेहैं−(इति) ऐसा [निश्चय है]। (अत्र) यहाँ [संसार में] (यजमानाय) यजमान के लिये (लोकम्) स्थान (अदधुः) उन [पुण्यात्माओं] ने दिया है, (यत्) जब कि (दिशः) दिशाओंको (भूतानि) सत्तावाले प्राणियों ने (अकल्पयन्त) समर्थ बनाया है ॥७॥
Connotation: - मनुष्य विद्वान्धर्मात्माओं के वेदविहित मार्ग पर चल कर विपत्तियों से पार होवें। धर्मात्मालोग ही संसार में मान्य होते हैं, क्योंकि वे पुरुषार्थी जीव सब दिशाओं कोउपकारी बनाते हैं ॥७॥