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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
उन्नति करने का उपदेश।
Word-Meaning: - (अग्ने) हे विद्वान्पुरुष ! (त्वम्) तूने (यम्) जिस [ब्रह्मचारी] को (समदहः) यथाविधि तपाया है [ब्रह्मचर्य तप कराया है] (तम् उ) उस को (पुनः) अवश्य (निः) निश्चय करके (वापय)बीज के समान फैला। (अत्र) यहाँ [संसार में] (क्याम्बूः) ज्ञान उपदेश करनेवाली, (शाण्डदूर्वा) दुःखनाश करनेवाली और (व्यल्कशा) विविध प्रकार शोभावाली [शक्ति] (रोहतु) प्रकट होवे ॥६॥
Connotation: - माता-पिता आचार्य आदिविद्वान् लोग ब्रह्मचर्य आदि तप करा के सन्तानों को ऐसी शिक्षा देवें कि जिससेवे शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति कर सकें ॥६॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेदमें है १०।१६।१३। और वही पाठ महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण में उद्धृत है ॥
Footnote: ६−(यम्) ब्रह्मचारिणम् (त्वम्) (अग्ने) हे विद्वन् (समदहः)समन्ताद् ब्रह्मचर्यादितपः कारितवानसि (तम्) ब्रह्मचारिणम् (उ) पादपूर्त्तौ (निः) निश्चयेन (वापय) डुवप बीजसन्ताने-णिच्। बीजवद् विस्तारय (पुनः) अवधारणे (क्याम्बूः) वातेर्डिच्च। उ० ४।१३४। कि कित वा ज्ञाने-इण्प्रत्ययः, डित्।णित्कशिपद्यर्त्तेः। उ० १।८५। अबि शब्दे ऊ प्रत्ययो णित्। ज्ञानस्य शब्दयित्रीज्ञापयित्री (अत्र) संसारे (रोहतु) प्रादुर्भवतु (शाण्डदूर्वा) शडि संघाते रोगेच-घञ्+दुर्व दूर्व हिंसायाम्-अच्, टाप्, दुःखस्य नाशयित्री (व्यल्कशा)कृदाधारार्चिकलिभ्यः कः। उ० ३।४०। वि+अल भूषणपर्याप्तिशक्तिवारणेषु-क प्रत्ययः शोमत्वर्थीयः। विविधशोभावती शक्तिः ॥
