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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
पुरुषार्थ करने का उपदेश।
Word-Meaning: - (इमौ) इन (वह्नी) लेचलनेवाले दोनों [प्राण और अपान] को (असुनीताय) बुद्धि से ले जाये गये (ते) तुझे (वोढवे) ले चलने के लिये (युनज्मि) मैं [परमेश्वर] युक्त करता हूँ। (ताभ्याम्)उन दोनों [प्राण और अपान] के द्वारा (यमस्य) नियम के (सदनम्) प्राप्तियोग्य पदको (च) और (समितीः) समितियों [सभाओं] को (अवगच्छतात्) निश्चय से तू प्राप्त हो॥५६॥
Connotation: - परमात्मा आज्ञा देताहै कि हे मनुष्य मैंने प्राण अपान आदि बुद्धि सहित तुझे इसलिये दिये हैं कि तूनियम के साथ उत्तम पद प्राप्त करके सभाओं में प्रतिष्ठा पावे ॥५६॥यह मन्त्रमहर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण में उद्धृत है ॥
Footnote: ५६−(इमौ)शरीरे वर्तमानौ (युनज्मि) अहं परमेश्वरो योजयामि (ते) द्वितीयार्थे चतुर्थी।त्वाम् (वह्नी) वोढारौ प्राणापानौ (असुनीताय) असुरितिप्रज्ञानामास्यत्यनर्थान्-निरु० १०।३४। प्रज्ञया नीतं प्रापितम् (वोढवे) वहप्रापणे-तवेन्प्रत्ययः। वोढुम्। नेतुम् (ताभ्याम्) प्राणापानाभ्यां द्वारा (यमस्य) नियमस्य (सदनम्) स्थानम्। पदम् (समितीः) सभाः (च) (अव) निश्चयेन (गच्छतात्) प्राप्नुहि ॥
