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अ॒भि त्वो॑र्णोमिपृथि॒व्या मा॒तुर्वस्त्रे॑ण भ॒द्रया॑। जी॒वेषु॑ भ॒द्रं तन्मयि॑ स्व॒धा पि॒तृषु॒सा त्वयि॑ ॥

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Pad Path

अभि । त्वा । ऊर्णोमि । पृथिव्या: । मातु: । वस्त्रेण । भद्रया । जीवेषु । भद्रम् । तत् । मयि । स्वधा । पितृषु । सा । त्वयि ॥२.५२॥

Atharvaveda » Kand:18» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:52


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

परमात्मा की उपासना का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे जीव !] (त्वा)तुझे (पृथिव्याः) जगत् के विस्तार करनेवाले परमेश्वर के [दिये] (भद्रया) कल्याणसे (अभि) सब ओर से (ऊर्णोमि) मैं ढकता हूँ, [जैसे] (मातुः) माता के (वस्त्रेण)वस्त्र से [बालक को]। (जीवेषु) जीवो में (भद्रम्) [जो] कल्याण हो, (तत्) वह (मयि) मुझ में [हो] (पितृषु) पितरों [रक्षक महात्माओं] में (स्वधा) [जो] आत्मधारण शक्ति हो, (सा) वह (त्वयि) तुझ में होवे ॥५२॥
Connotation: - प्रत्येक मनुष्यपरमात्मा की शरण में रहकर इस प्रकार सुख पावे, जैसे बालक माता के पास पाता है, और ऐसा प्रयत्न करे कि सब प्राणी एक दूसरे के समान सुख पावें और ज्ञानीमहात्माओं के समान आत्मावलम्बन करें ॥५२॥
Footnote: ५२−(अभि) अभितः। सर्वतः (त्वा) जीवम् (ऊर्णोमि) आच्छादयामि (पृथिव्याः) प्रथेः षिवन्०। उ० १।१५०। प्रथ प्रख्याने−षिवन्, संप्रसारणं ङीष् च। प्रथयति विस्तारयति सर्वं जगत् सा पृथिवी परमेश्वरः।जगद्विस्तारकस्य परमेश्वरस्य (मातुः) जनन्याः (वस्त्रेण) वाससा यथा (भद्रया)सुपां सुलुक्०। पा० ७।१।३९। विभक्तेर्याप्रत्ययः। भद्रेण। कल्याणेन (जीवेषु)प्राणिषु (भद्रम्) यत् कल्याणम् (तत्) (मयि) प्राणिनि (स्वधा) या स्वधारणशक्तिः (पितृषु) पालकेषु महात्मसु (सा) (त्वयि) प्राणिनि भवतु ॥