पितरों और सन्तानों के कर्त्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (नः) हमारे (अङ्गिरसः)महाविज्ञानी (पितरः) पितर [रक्षक पिता आदि बुद्धिमान् लोग] (नवग्वाः) स्तुतियोग्य चरित्रवाले [वा नवीन-नवीन विद्याएँ प्राप्त करने और कराने हारे], (अथर्वाणः) निश्चय स्वभाववाले, (भृगवः) परिपक्व ज्ञानयुक्त और (सोम्यासः)ऐश्वर्य पाने योग्य [होवें]। (तेषाम्) उन (यज्ञियानाम्) पूजनीय महापुरुषों की (अपि) ही (सुमतौ) सुमति में और (भद्रे) कल्याण करने हारी (सौमनसे) मन कीप्रसन्नता में (वयम्) हम (स्याम) होवें ॥५८॥
Connotation: - सन्तानों को योग्य हैकि बड़े-बड़े विज्ञानी माता-पिता आदि पूजनीय महात्माओं की उत्तम शिक्षा को सदाग्रहण करें ॥५८॥यह मन्त्र ऋग्वेद में है−१०।१४।६ और यजुर्वेद में १९।५० ॥इसमन्त्र के उत्तरार्द्ध का मिलान करो-अथर्व० ६।५५।३ तथा ७।९५।१ ॥