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अपे॑त॒ वीत॒ विच॑ सर्प॒तातो॒ऽस्मा ए॒तं पि॒तरो॑ लो॒कम॑क्रन्।अहो॑भिर॒द्भिर॒क्तुभि॒र्व्यक्तं य॒मो द॑दात्यव॒सान॑मस्मै ॥

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Pad Path

अप । इत । वि । इत । तवि । च । सर्पत । अत: । अस्मै । एतम् । पितर: । लोकम् । अक्रन् । अह:ऽभि: । अत्ऽभि: । अक्तुऽभि: । विऽअक्तम् । यम: । ददाति । अवऽसानम् । अस्मै ॥१.५५॥

Atharvaveda » Kand:18» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:55


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मनुष्य की उन्नति का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे विद्वानो !] (अतः)यहाँ से [इस घर वा विद्यालय आदि से] (अप इत) बाहिर चलो, (वि इत) विविध प्रकारचलो, (च) और (वि सर्पत) फैल जाओ, (अस्मै) इस [जीव के हित] के लिये (एतम्) यह (लोकम्) लोक [समाज] (पितरः) पितरों [रक्षक महात्माओं] ने (अकरन्) बनाया है। (यमः) यम [न्यायकारी परमात्मा] (अस्मै) इस [समाज] को (अहोभिः) दिनों से, (अक्तुभिः) रातों से और (अद्भिः) जल [अन्न जल आदि] से (व्यक्तम्) स्पष्ट (अवसानम्) विराम [स्थिर पद] (ददाति) देता है ॥५५॥
Connotation: - ब्रह्मचारी लोगमहापुरुषों के बनाये विद्यालय आदि से विद्या समाप्त करके विविध उद्योग करें औरपरमात्मा के उपकारों को विचारते हुए अपने समय और आहार-विहार आदि का सुप्रयोगकरके समाज को स्थिर सुख पहुँचावें ॥५५॥यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद में भी है−१२।४५ ॥
Footnote: ५५−(अप इत) दूरे गच्छत (वि इत) विविधं गच्छत (च) (वि सर्पत) विस्तृता भवत (अतः) अस्मात् स्थानात् (अस्मै) जीवाय (एतम्) (पितरः) पालकाः पुरुषाः (लोकम्)दर्शनीयं समाजम् (अकरन्) कृतवन्तः (अहोभिः) दिवसैः (अद्भिः) जलेन। अन्नजलादिना (अक्तुभिः) रात्रिभिः (व्यक्तम्) विशदम् (यमः) न्यायकारी परमात्मा (ददाति) (अवसानम्) विरामम्। स्थिरपदम् (अस्मै) समाजाय ॥