Go To Mantra
Viewed 79 times

प्रेहि॒ प्रेहि॑प॒थिभिः॑ पू॒र्याणै॒र्येना॑ ते॒ पूर्वे॑ पि॒तरः॒ परे॑ताः। उ॒भा राजा॑नौस्व॒धया॒ मद॑न्तौ य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वम् ॥

Mantra Audio
Pad Path

प्र । इहि । प्र । इहि । पथिऽभि: । पू:ऽयानै: । येन । ते । पूर्वे । पितर: । पराऽइता: । उभा । राजानौ । स्वधया । मदन्तौ । यमम् । पश्यासि । वरुणम् । च । देवम् ॥१.५४॥

Atharvaveda » Kand:18» Sukta:1» Paryayah:0» Mantra:54


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

मनुष्य की उन्नति का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे मनुष्य !] तू (प्रइहि) आगे बढ़, (पूर्याणैः) नगरों को जानेवाले (पथिभिः) मार्गों से (प्र इहि) आगेबढ़, (येन) जिस [कर्म] से (ते) तेरे (पूर्वे) पहिले (पितरः) पितर [रक्षक पिताआदि महापुरुष] (परेताः) पराक्रम से गये हैं। और (स्वधया) अपनी धारण शक्ति से (मन्दन्तौ) तृप्त होते हुए (उभा) दोनों (राजानौ) शोभायमान, [अर्थात्] (देवम्)प्रकाशमान (यमम्) यम [न्यायकारी परमात्मा] को (च) और (वरुणम्) वरुण [श्रेष्ठजीवात्मा] को (पश्यासि) तू देखता रह ॥५४॥
Connotation: - मनुष्य को योग्य है किपूर्व महात्माओं के वेदोक्त मार्ग पर चल कर देश-देशान्तरों में जाकर उन्नति करेऔर सदा परमात्मा की उपासना से जीवात्मा की दशा का चिन्तन करता रहे ॥५४॥मन्त्र५४, ५५ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।१४।७, ९ और दोनों का ऋग्वेदपाठ महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण में उद्धृत है ॥
Footnote: ५४−(प्रोह)प्रकर्षेण गच्छ (प्रेहि) (पथिभिः) मार्गैः (पूर्याणैः) पुरो नगरान् (येन) कर्मणा (ते) तव (पूर्वे) पूर्वजा (पितरः) पालका महापुरुषाः (परेताः) पराक्रमेण गताः (उभा) उभौ (राजानौ) शोभायमानौ (स्वधया) स्वधारणशक्त्या (मदन्तौ) तृप्यन्तौ (यमम्) न्यायकारिणं परमात्मानम् (पश्यासि) पश्येः (वरुणम्) श्रेष्ठं जीवात्मानम् (च) (देवम्) प्रकाशमानम् ॥