पितरों और सन्तानों के कर्त्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (बर्हिषदः) हे उत्तमपद पर बैठने हारे (पितरः) पितरो [पालनेवाले वीरो] (ऊती) रक्षा के साथ (अर्वाक्)सामने [होकर] (इमा) इन (हव्या) ग्राह्य भोजन आदि को (जुषध्वम्) सेवन करो [जिनको] (वः) तुम्हारे लिये (चकृम) हम ने बनाया है। (ते) वे तुम (शन्तमेन) अत्यन्तसुखदायक (अवसा) रक्षा के साथ (आ गत) आओ, (अध) फिर (नः) हमारे लिये (शम्) सुख, (योः) अभय और (अरपः) निर्दोष आचरण (दधात) धारण करते रहो ॥५१॥
Connotation: - सब मनुष्य वयोवृद्ध औरविद्यावृद्ध पितरों का भली-भाँति सत्कार करें और उनसे शारीरिक, आत्मिक औरसामाजिक उन्नति की शिक्षा पावें ॥५१॥मन्त्र ५१, ५२ कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं१०।१५।४, ६ और यजुर्वेद में भी−१९।५५, ६२ ॥