पितरों के कर्त्तव्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (मातली) ऐश्वर्य सिद्धकरनेवाला, (यमः) संयमी और (बृहस्पतिः) बृहस्पति [बड़ी विद्याओं का रक्षक पुरुष] (कव्यैः) बुद्धिमानों के हितकारी (अङ्गिरोभिः) विज्ञानी महर्षियों द्वारा (ऋक्वभिः) बड़ाईवाले कामों से (वावृधानः) बढ़नेवाला होता है। (च) और (यान्) जिन [पितरों] को (देवाः) विद्वानों ने (वावृधुः) बढ़ाया है, (च) और (ये) जिन [पितरों]ने (देवान्) विद्वानों को [बढ़ाया है], (ते) वे (पितरः) पितर [पालन करनेवाले]लोग (नः) हमें (हवेषु) संग्रामों में (अवन्तु) बचावें ॥४७॥
Connotation: - ऐश्वर्य चाहनेवालाजितेन्द्रिय पुरुष बड़े-बड़े विद्वानों के उपदेश और वेदादि शास्त्रों के मनन सेउन्नति करके संसार की रक्षा करें ॥४७॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।१४।३। और ऋग्वेद पाठ महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि अन्त्येष्टिप्रकरण मेंउद्धृत है ॥