पितरों के सत्कार का उपदेश।
Word-Meaning: - (अवरे) छोटे पदवाले (सोम्यासः) ऐश्वर्य के हितकारी, (पितरः) पितर [पालन करनेवाले विद्वान्] (उत्)उत्तमता से, (परासः) ऊँचे पदवाले (उत्) उत्तमता से और (मध्यमाः) मध्य पदवाले (उत्) उत्तमता से (ईरताम्) चलें। (ये) जिन (अवृकाः) भेड़िये वा चोर का स्वभाव नरखनेवाले, (ऋतज्ञाः) सत्य धर्म जाननेवाले [विद्वानों] ने (असुम्) प्राण [बल वाजीवन] (ईयुः) पाया है (ते) वे (पितरः) पितर [पालन करनेवाले] लोग (नः) हमें (हवेषु) संग्रामों में (अवन्तु) बचावें ॥४४॥
Connotation: - प्रधान पुरुष कोचाहिये कि विद्या, कर्म और स्वभाव की योग्यता के अनुसार विद्वानों का सत्कारकरे, जिससे वे लोग सबकी रक्षा करने में सदा तत्पर रहें ॥४४॥मन्त्र ४४-४६ कुछभेद से ऋग्वेद में हैं−१०।१५।१, ३, २ और यजुर्वेद में १९।४९, ५६, ६८ और महर्षिदयानन्दकृत ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका पितृयज्ञविषय में भी व्याख्यात हैं॥