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तद॒ग्निरा॑ह॒तदु॒ सोम॑ आह पू॒षा मा॑ धात्सुकृ॒तस्य॑ लो॒के ॥

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तत् । अग्नि: । आह । तत् । ऊं इति । सोम: । आह । पूषा । मा । धात् । सुऽकृतस्य । लोके ॥९.२॥

Atharvaveda » Kand:16» Sukta:9» Paryayah:0» Mantra:2


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

सुख की प्राप्ति का उपदेश।

Word-Meaning: - (तत्) यह (अग्निः)ज्ञानस्वरूप परमेश्वर (आह) कहता है, (तत् उ) यही (सोमः) सर्वोत्पादक परमात्मा (आह) कहता है, (पूषा) पोषण करनेवाला जगदीश्वर (मा) मुझे (सुकृतस्य) पुण्य कर्मके (लोके) लोक [समाज] में (धात्) रक्खे ॥२॥
Connotation: - परमात्मा निरन्तरआज्ञा देता है कि मनुष्य सदा धर्मात्माओं के समाज में रह कर उन्नति करे ॥२॥इसमन्त्र का कुछ भाग आ चुका है-अ० ८।५।५ ॥
Footnote: २−(तत्) इदम् (अग्निः)ज्ञानस्वरूपपरमेश्वरः (आह) ब्रवीति। उपदिशति (तत्) (उ) एव (सोमः) सर्वोत्पादकःपरमात्मा (आह) (पूषा) सर्वपोषकजगदीश्वरः (मा) माम् (धात्) दध्यात् (सुकृतस्य)पुण्यकर्मणः (लोके) समाजे ॥