परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
Word-Meaning: - (सः) वह [मूर्ख] (वै)निश्चय करके (वैरूपाय) वैरूप [विविध पदार्थों के जतानेवाले वेदज्ञान] के लिये (चच) और भी (वैराजाय) वैराज [विराट् रूप, बड़े ऐश्वर्यवान् वा प्रकाशमान परमात्माके स्वरूप के प्राप्त करानेवाले मोक्षज्ञान] के लिये (च) और (अद्भ्यः) प्रजाओंके लिये (च) और (राज्ञे) राजा [ऐश्वर्यवान्] (वरुणाय) श्रेष्ठ जीव [मनुष्य] केलिये (आ) सब प्रकार (वृश्चते) दोषी होता है, (यः) जो मूर्ख (एवम्) व्यापक (विद्वांसम्) ज्ञानवान् (व्रात्यम्) व्रात्य [सब समूहों के हितकारी परमात्मा] को (उपवदति) बुरा कहता है ॥१७॥
Connotation: - परमात्मा के ज्ञान सेविमुख पुरुष सब संसार की हानि करके पापी होता है ॥१७॥