परमेश्वर की सर्वत्र व्यापकता का उपदेश।
Word-Meaning: - (सः) वह [विद्वान्] (वै) निश्चय करके (यज्ञायज्ञियस्य) सब यज्ञों के हितकारी [वेदज्ञान] का (च च)और भी (वामदेव्यस्य) वामदेव [श्रेष्ठ परमात्मा] से जताये गये [भूतपञ्चक] का (च)और (यज्ञस्य) यज्ञ [पूजनीय व्यवहार] का (च) और (यजमानस्य) यजमान [पूजनीय व्यवहारकरनेवाले पुरुष] का (च) और (पशूनाम्) सब जीव-जन्तुओं का (प्रियम्) प्रिय (धाम)धाम [घर], (भवति) होता है। और (तस्य) उस [विद्वान्] के लिये (दक्षिणायाम्)दाहिनी [वा दक्षिण] (दिशि) दिशा में ॥१२॥
Connotation: - जो मनुष्य परमात्मा केज्ञान के साथ अविद्या के त्याग और विद्या की प्राप्ति से योग्य पदार्थों केउपकार और अयोग्यों के अपकार को जानकर अपना कर्तव्य करता है, वह संसार मेंकीर्तिमान् और यशस्वी होता है ॥१२-१४॥