Go To Mantra
Viewed 130 times

तस्य॒व्रात्य॑स्य।योऽस्य॑ ष॒ष्ठो व्या॒नस्त आ॑र्त॒वाः ॥

Mantra Audio
Pad Path

तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । षष्ठ: । विऽआन: । ते । आर्तवा: ॥१७.६॥

Atharvaveda » Kand:15» Sukta:17» Paryayah:0» Mantra:6


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (षष्ठः) छठा (व्यानः) व्यान [सब शरीर में फैला हुआ वायु] है, (ते) वे (आर्तवाः)ऋतुओं में उत्पन्न पदार्थ हैं [अर्थात् वह फूल आदि की उत्पत्ति और उपकार काज्ञान देता है] ॥६॥
Connotation: - सत्यव्रतधारी महात्माअतिथि संन्यासी अपने प्रत्येक व्यान वायु की चेष्टा में संसार का उपकार करताहै, जैसे वह प्रथम व्यान में भूमिविद्या, दूसरे में अन्तरिक्षविद्या, तीसरे मेंसूर्यविद्या वा आकाशविद्या, चौथे में नक्षत्रविद्या, पाँचवें में वसन्त आदिऋतुविद्या, छठे में ऋतुओं में उत्पन्न पुष्प फल आदि पदार्थविद्या और सातवें मेंसंवत्सर अर्थात् काल की उपभोगविद्या का उपदेश करता है ॥१-७॥
Footnote: ६−(आर्तवाः) ऋतुभवानांपुष्पफलादिपदार्थानां ज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥