Go To Mantra
Viewed 108 times

तस्य॒व्रात्य॑स्य।योऽस्य॑ द्वि॒तीयो॑ व्या॒नस्तद॒न्तरि॑क्षम् ॥

Mantra Audio
Pad Path

तस्य । व्रात्यस्य । य: । अस्य । द्व‍ितीय: । विऽआन: । तत् । अन्तरिक्षम् ॥१७.२॥

Atharvaveda » Kand:15» Sukta:17» Paryayah:0» Mantra:2


PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

व्रात्य के सामर्थ्य का उपदेश।

Word-Meaning: - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (द्वितीयः) दूसरा (व्यानः) व्यान [शरीर में फैला हुआ वायु] है, (तत्) वह (अन्तरिक्षम्) मध्यलोक है [अर्थात् वह वायुमण्डल, मेघमण्डल आदि का ज्ञान देताहै] ॥२॥
Connotation: - सत्यव्रतधारी महात्माअतिथि संन्यासी अपने प्रत्येक व्यान वायु की चेष्टा में संसार का उपकार करताहै, जैसे वह प्रथम व्यान में भूमिविद्या, दूसरे में अन्तरिक्षविद्या, तीसरे मेंसूर्यविद्या वा आकाशविद्या, चौथे में नक्षत्रविद्या, पाँचवें में वसन्त आदिऋतुविद्या, छठे में ऋतुओं में उत्पन्न पुष्प फल आदि पदार्थविद्या और सातवें मेंसंवत्सर अर्थात् काल की उपभोगविद्या का उपदेश करता है ॥१-७॥
Footnote: २−(अन्तरिक्षम्)मध्यलोकस्थवायुमण्डलमेघमण्डलादिज्ञानम्। अन्यत् पूर्ववत् स्पष्टं च ॥