Reads 51 times
PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथि के सामर्थ्य का उपदेश।
Word-Meaning: - (तस्य) उस (व्रात्यस्य) व्रात्य [सत्यव्रतधारी अतिथि] का−(यः) जो (अस्य) इस [व्रात्य] का (षष्ठः) छठा (अपानः) अपान [प्रश्वास] है, (स यज्ञः) वह यज्ञ है [मानो वहपरमेश्वर और विद्वानों का सत्कार, परस्पर संयोग और विद्या आदि दान है] ॥६॥
Connotation: - जैसे सामान्य मनुष्यज्ञानप्राप्ति के लिये पौर्णमासी आदि यज्ञ करके श्रद्धावान् होते हैं, वैसे हीविद्वान् अतिथि संन्यासी उस कार्मिक यज्ञ आदि के स्थान पर अपनी जितेन्द्रियतासे मानसिक यज्ञ करके यज्ञफल प्राप्त करते हैं, अर्थात् ब्रह्मविद्या,ज्योतिषविद्या आदि अनेक विद्याओं का प्रचार करके संसार में प्रतिष्ठा पाते हैं॥१-७॥
Footnote: ६−(यज्ञः)यजयाचयतविच्छप्रच्छरक्षो नङ्। पा० ३।३।९०। यज देवपूजासंगतिकरणदानेषु-नङ्।परमेश्वरविद्वत्सत्कारपरस्परसंयोगविद्यादिदानव्यवहारः। अन्यत् पूर्ववत्स्पष्टं च ॥
