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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथिके उपकार का उपदेश।
Word-Meaning: - (सः) वह [व्रात्यअतिथि] (यत्) जब (प्रतीचीम्) पश्चिम वा पीछेवाली (दिशम् अनु) दिशा की ओर (व्यचलत्) विचरा, वह (वरुणः) श्रेष्ठ (राजा) राजा [ऐश्वर्यवान्] (भूत्वा) होकरऔर (अपः) [कर्मों में व्यापक रहनेवाली] इन्द्रियों को (अन्नादीः) जीवनरक्षक (कृत्वा) करके (अनुव्यचलत्) लगातार चला गया ॥५॥
Connotation: - मन्त्र १, २ के समानहै ॥५, ६॥
Footnote: ५, ६−(प्रतीचीम्)पश्चिमाम्। पश्चाद्भागस्थाम् (वरुणः) श्रेष्ठः (राजा) राजृ दीप्तौ ऐश्वर्येच-कनिन्। ऐश्वर्यवान्। भूपालः (अपः) आपः=इन्द्रियाणि=आपनानि-निरु० १२।३७।कर्मसु व्यापकानीन्द्रियाणि (अन्नादीः) म० १। अन्नाद-ङीप्। जीवनरक्षिकाः (अद्भिः) इन्द्रियैः (अन्नादीभिः) जीवनरक्षिकाभिः। अन्यत् पूर्ववत्-म० १, २ ॥
