Devata: त्रिपदा साम्नी बृहती
Rishi: अध्यात्म अथवा व्रात्य
Chhanda: अथर्वा
Swara: अध्यात्म प्रकरण सूक्त
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
अतिथिसत्कार की महिमा का उपदेश।
Word-Meaning: - (तत्) फिर (एवम्)व्यापक परमात्मा को (विद्वान्) जानता हुआ (व्रात्यः) व्रात्य [सद्व्रतधारी, सदाचारी] (अतिथिः) अतिथि [नित्य मिलने योग्य सत्पुरुष] (यस्य राज्ञः) जिस राजाके (गृहान्) घरों में (आगच्छेत्) आवे ॥१॥
Connotation: - जब ब्रह्मवादी आप्तविद्वान् अतिथि राजा के घर आवे, राजा उसको अपने से अधिक गुणी जानकर यथावत्सत्कार करे, जिस से उसके सदुपदेश से दोषों के मिटने पर उसके कुल की और राज्य कीवृद्धि होवे ॥१, २॥
Footnote: १−(तत्) तदा (यस्य) (एवम्) सू० २ म० ३। इण् गतौ-वन्। व्यापकं परमात्मानम् (विद्वान्) विद ज्ञाने-शतृ, वसुरादेशः। जानन् (व्रात्यः) सू० १।१। व्रत-ण्य। व्रतधारी। सदाचारी (राज्ञः)नरपतेः (अतिथिः) अ० ७।२१।१। ऋतन्यञ्जिवन्य०। उ० ४।२। अत सातत्यगमने-इथिन्।अतनशीलः। नित्यं प्रापणीयः। विद्वान्। अभ्यागतः (गृहान्) (आगच्छेत्) ॥
