Word-Meaning: - [हे पत्नी !] तू (शतशारदाय) सौ वर्ष तक (दीर्घायुत्वाय) दीर्घ जीवन पाने के लिये (सुबुधा) उत्तमबुद्धिवाली और (बुध्यमाना) सावधान रहकर (प्र बुध्यस्व) जागती रहे। (गृहान्) घरों [घर के पदार्थों] को (गच्छ) प्राप्त हो, (यथा) जिस से तू, (गृहपत्नी) गृहपत्नी (असः) होवे, (सविता) सब ऐश्वर्यवाला परमात्मा (ते) तेरे (आयुः) जीवन को (दीर्घम्) दीर्घ (कृणोतु) करे ॥७५॥
Connotation: - पत्नी को योग्य है किपरमात्मा का सदा ध्यान करके गृहकार्यों में सावधान रहकर और चिरंजीविनी होकर कुलकी वृद्धि करे ॥७५॥यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण मेंव्याख्यात है ॥ इति द्वितीयोऽनुवाकः ॥इत्येकोनत्रिंशः प्रपाठकः ॥इति चतुर्दशं काण्डम् ॥ इतिश्रीमद्राजाधिराजप्रथितमहागुणमहिमश्रीसयाजीरावगायकवाड़ाधिष्ठितबड़ोदेपुरीगतश्रावणमासपरीयाक्षाम् ऋक्सामाथर्ववेदभाष्येषु लब्धदक्षिणेन श्रीपण्डितक्षेमकरणदासत्रिवेदिना कृते अथर्ववेदभाष्ये चतुर्दशं काण्डं समाप्तम् ॥