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आ वां॑ प्र॒जांज॑नयतु प्र॒जाप॑तिरहोरा॒त्राभ्यां॒ सम॑नक्त्वर्य॒मा। अदु॑र्मङ्गली पतिलो॒कमावि॑शे॒मं शं नो॑ भव द्वि॒पदे॒ शं चतु॑ष्पदे ॥

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Pad Path

आ । वाम् । प्रऽजाम् । जनयतु । प्रजाऽपति: । अहोरात्राभ्याम् । सम् । अनक्तु । अर्यमा। अदु:ऽमङ्गली । पतिऽलोकम् । आ । विश । इमम् । शम् । न: । भव । द्विऽपदे । शम् । चतु:ऽपदे ॥२.४०॥

Atharvaveda » Kand:14» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:40


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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI

गृहआश्रम का उपदेश।

Word-Meaning: - [हे वधू-वर !] (प्रजापतिः) प्रजापालक, (अर्यमा) श्रेष्ठों का मान करनेवाला, [परमात्मा] (वाम्)तुम दोनों को (प्रजाम्) सन्तान (आ जनयतु) उत्पन्न करे और (अहोरात्राभ्याम्) दिनऔर रात्रि के साथ [सबको] (सम् अनक्तु) संयुक्त करे। [हे वधू !] (अदुर्मङ्गली)दुष्टलक्षणरहित तू (इमम्) इस (पतिलोकम्) पति लोक [पतिकुल] में (आ विश) प्रवेशकर, और (नः) हमारे (द्विपदे) दोपायों के लिये (शम्) सुखदायक और (चतुष्पदे)चौपायों के लिये (शम्) सुखदायक (भव) हो ॥४०॥
Connotation: - जगत्पालक परमेश्वर कीउपासना करके युक्त आहार-विहार, ऋतुगमन आदि योग्य क्रिया के साथ पति-पत्नी चिरजीवीसन्तान उत्पन्न करें, जिससे पतिकुल में उस वधू के शुभागमन से सब मनुष्य और गौआदि पशु बढ़कर प्रसन्न रहें ॥४०॥यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में है−१०।८५।४७॥
Footnote: ४०−(वाम्) युवाभ्याम् (प्रजाम्) सन्तानम् (आ जनयतु) उत्पादयतु (प्रजापतिः)परमेश्वरः (अहोरात्राभ्याम्) रात्रिदिनाभ्याम्। सर्वदेत्यर्थः (समनक्तु)संयोजयतु (अर्यमा) श्रेष्ठानां मानकर्ता (अदुर्मङ्गली) दुष्टलक्षणरहिता (पतिलोकम्) पतिकुलम् (आ विश) प्रविश (इमम्) (शम्) सुखप्रदा (नः) अस्माकम् (भव) (द्विपदे) मनुष्यादिसमूहाय (शम्) (चतुष्पदे) गवादिपशुसमूहाय ॥