Word-Meaning: - (पितरौ) हे [होनेवाले]माता-पिता ! (ऋत्विये) ऋतुकाल [गर्भाधानयोग्य समय] को प्राप्त दो वस्तु [केसमान] (संसृजेथाम्) तुम दोनों मिलो, (च) और (रेतसः) वीर्य से [वीर्य और रज केमेल से] तुम दोनों (माता पिता) माता-पिता (भवाथः) होओ। (मर्यः इव) नर के समान [हे पति !] (एनाम्) इस (योषाम्) अपनी पत्नी के (अधि रोहय) ऊपर हो, और (प्रजाम्)सन्तान को (कृण्वाथाम्) तुम दोनों उत्पन्न करो, और (इह) यहाँ [गृहाश्रम में] (रयिम्) धन को (पुष्यतम्) बढ़ाओ ॥३७॥
Connotation: - जैसे वृक्ष आदि के बीजके मिले हुए दो टुकड़े वर्षा ऋतु में पृथिवी के संयोग से अङ्कुर उत्पन्न करतेहैं, वैसे ही युवा पति-पत्नी गर्भाधानविधि के अनुसार रतिक्रिया करके वीर्य औररज के संयोग से सन्तान उत्पन्न करें और धनी होकर सुखी होवें ॥३७॥मन्त्र ३७ और ३८महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥