Word-Meaning: - [हे वधू !] तू (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित्त होकर (तल्पम्) पर्यङ्क पर (आ रोह) चढ़, ओर (इह) यहाँ [गृहाश्रम में] (अस्मै पत्ये) इस पति के लिये (प्रजाम्) सन्तान (जनय) उत्पन्नकर। (इन्द्राणी इव) इन्द्राणी [बड़े ऐश्वर्यवान् मनुष्य की पत्नी वा सूर्य कीकान्ति] के समान, (सु बुधा) सुन्दर ज्ञानवाली (बुध्यमाना) सावधान तू (ज्योतिरग्राः) ज्योति को आगे रखनेवाली (उषसः प्रति) प्रभातवेलाओं में (जागरासि) जागती रहे ॥३१॥
Connotation: - वधू को योग्य है किप्रसन्नचित्त होकर पति के साथ उच्च पद पर विराजकर उत्तम सन्तान उत्पन्न करे औरसावधान रहकर सूर्योदय से पहिले उठकर शारीरिक और आत्मिक उन्नति करे ॥३१॥मन्त्र ३१और ३२ महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि गृहाश्रमप्रकरण में व्याख्यात हैं ॥