अघो॑रचक्षु॒रप॑तिघ्नी स्यो॒ना श॒ग्मा सु॒शेवा॑ सु॒यमा॑ गृ॒हेभ्यः॑।वी॑र॒सूर्दे॒वृका॑मा॒ सं त्वयै॑धिषीमहि सुमन॒स्यमा॑ना ॥
Pad Path
अघोरऽचक्षु: । अपतिऽघ्नी । स्योना । शग्मा । सुऽशेवा। सुऽयमा । गृहेभ्य: । वीरऽसू: । देवृऽकामा ।सम् । त्वया । एधिषीमहि । सुऽमनस्यमाना ॥२.१७॥
Atharvaveda » Kand:14» Sukta:2» Paryayah:0» Mantra:17
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PANDIT KSHEMKARANDAS TRIVEDI
गृहआश्रम का उपदेश।
Word-Meaning: - [हे वधू !] तू (गृहेभ्यः) घरवालों के लिये (अघोरचक्षुः) प्रिय दृष्टिवाली, (अपतिघ्नी) पति को नसतानेवाली, (स्योना) सुखदायिनी (शग्मा) कार्यकुशला, (सुशेवा) सुन्दर सेवा योग्य, (सुयमा) अच्छे नियमोंवाली, (वीरसूः) वीरों की उत्पन्न करनेवाली, (देवृकामा)देवरों [पति के छोटे-बड़े भाइयों] से प्रीति रखनेवाली और (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित्तवाली [रह], (त्वया) तेरे साथ (सम् एधिषीमहि) हम मिलकर बढ़ते रहें ॥१७॥
Connotation: - गृहपत्नी कर्मकुशलहोकर शुद्ध अन्तःकरण से सदा सबका हित करे, जिससे सब घर वृद्धि करता जावे ॥१७॥यहऔर आगे का मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद में हैं−१०।८५।४४, और यह मन्त्र महर्षिदयानन्दकृत संस्कारविधि विवाहप्रकरण में वधू-वर के यज्ञकुण्ड की प्रदक्षिणाकरने में और फिर वर के घर पहुँचकर उनके आज्याहुति देने में व्याख्यात है॥
Footnote: १७−(अघोरचक्षुः) अभयङ्करनेत्री (अपतिघ्नी) पत्युरहिंसित्री (स्योना) सुखप्रदा (शग्मा) युजिरुचितिजां कुश्च। उ० १।१४९। शक्लृ शक्तौ-मक्, कस्य गः, अर्शआद्यच्, टाप्। शक्म शग्म कर्मनाम-निघ० १।२। कर्मकुशला (सुशेवा) सुसेवनीया (सुयमा)सुनियमवती (गृहेभ्यः) गृहपुरुषेभ्यः (वीरसूः) वीराणां प्रसवित्री (देवृकामा)देवृषु पतिभ्रातृषु प्रीतियुक्ता (सम्) सम्यक् (एधिषीमहि) वर्धिषीमहि (सुमनस्यमाना) प्रसन्नचित्ता ॥
